बुंदेलखंड के बारे में जानने योग्य प्रमुख तथ्य

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बुंदेलखंड क्षेत्र की सीमा उत्तर में गंगा यमुना का मैदान तथा दक्षिण में विंध्याचल पर्वत बनाता है। यह मध्यम ढलान वाली उच्च भूमि है।  बुंदेलखंड की समुद्र तल से ऊंचाई 600 मीटर है।  यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के बीच में स्थित है। 

बुंदेलखंड राज्य की अलग मांग 

1960 के दशक की शुरुआत से इसके विकास को बढ़ावा देने के लिए अलग से बुंदेलखंड राज्य बनाने की मांग चल रही है।  परंतु अभी तक यह अलग नहीं हो सका।  1956 के पहले बुंदेलखंड एक राज्य था परंतु बाद में इसका विलय मध्य भारत में करके मध्यप्रदेश बना दिया गया तथा शेष भाग को उत्तर प्रदेश में विलय कर दिया गया।  बुंदेलखंड लाल रेत और हीरे जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है परंतु फिर भी यह आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत पिछड़ा हुआ है। बुंदेलखंड के बहुत से लोग आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। भारतीय राजनीति में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। जिससे इस क्षेत्र की ओर सरकारों का ध्यान बहुत कम ही गया है।  परंतु वर्तमान समय में इस क्षेत्र के लिए अलग से पैकेज निर्धारित किया गया है। बुंदेलखंड की अलग राज्य की मांग जोर-शोर से उठाने वाली  बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के अनुसार 7 जिले उत्तर प्रदेश के तथा 6 जिले मध्य प्रदेश के मिलाकर बुंदेलखंड राज्य बनना है। इस क्षेत्र में प्रगति करते हुए वर्ष 2011 में मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने इस राज्य के समर्थन में प्रस्ताव रखा था। 

बुंदेलखंड का इतिहास 

बुंदेलखंड अपने समृद्धशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध रहा है। बुंदेलखंड का इतिहास प्राचीन समय से पुराणों में वर्णित है। प्राचीन समय में बुंदेलखंड को अनेक नामों से पुकारा जाता था ऐसा माना जाता है कि विंध्याचल पर्वत के कारण इसका नाम विन्धयेलखण्ड पड़ा। इसके अन्य नाम भुक्ति ,जुझौति, जुझारखण्ड रहे हैं। यहां पर आदिमानव काल के भी पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं जो चित्रकूट जिले के पाठा क्षेत्र, सागर, छतरपुर, पन्ना और दतिया जिला में विस्तृत हैं। कहा जाता है कि प्राचीन काल में आर्यों ने भी बुंदेलखंड क्षेत्र में अपना आधिपत्य नहीं जमा पाया था। परंतु कालांतर में जब आर्य दक्षिण में फैले तब उनका परिचय बुंदेलखंड से हुआ। यहां पर रहने वाले लोगों को वेदों के अनुसार दस्यु, यातुधान और राक्षस कहा जाता था। यहां पर नर्मदा और यमुना नदी के बीच घना जंगल होने के कारण प्राचीन ऋषि मुनि यहां तपस्या करते रहते थे। यहां पर कई ऋषि मुनियों की तपोस्थली है। जब भगवान रामचंद्र को वनवास हुआ तो उन्होंने 12 वर्ष इन्हीं ऋषि-मुनियों के आश्रम में बिताए थे। 

महाभारत काल में भी चेर साम्राज्य का वर्णन मिलता है। जिसकी सीमा बेतवा नदी से लेकर उत्तर में यमुना नदी तक फैली हुई थी। जिसकी राजधानी चंदेरी थी और उसका शासक शिशुपाल माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान व्यास ने बुंदेलखंड के कालपी क्षेत्र में महाभारत की रचना की थी। महाभारत काल के दौरान पांडवों द्वारा कौरवों का वध करने के कारण श्राप मिला। उस श्राप  को दूर करने के लिए रवि सप्तमी के दिन अर्थमार्शान कुंड में स्नान किया। यह धारकुंडी चित्रकूट के पास स्थित है। 

छठी शताब्दी ईसा पूर्व महाजनपद काल के दौरान यहां अवंती राज्य वक्त और छेदी शासकों का आधिपत्य था। जिसे बाद में मगध ने जीत लिया।  तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक यहां पर अशोक का शासन था। जिसके शिलालेख गुजरात, सांची और रूपनाथ जबलपुर में पाए गए हैं। मौर्य वंश के पतन के बाद यहां पर शुंग कण्व सातवाहनों ने शासन किया। तीसरी शताब्दी में सातवाहनों के पतन के बाद नागा वंश का उदय हुआ। चौथी शताब्दी ईस्वी में वाकाटक इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण शासक थे। जिनका राज्य पन्ना और सतना तक था। जिनके समय यहां मजबूत अर्थव्यवस्था का उदय हुआ तथा नगरीकरण देखने को मिला। इस अवधि के सिक्के सागर से 60 किलोमीटर दूर  एरण में बहुत बड़ी मात्रा में प्राप्त हुए हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र में चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी तक गुप्त साम्राज्य का शासन हुआ। जो पांचवी शताब्दी ईस्वी में बिखरना शुरू हो गया था। यहां हर्षवर्धन का शासन उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक फैला हुआ था। गुप्तों के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक देवगढ़ में है। गुप्तों के बाद यहां गुर्जर प्रतिहार वंश के कुछ शासकों ने यहां के कुछ हिस्सों में शासन किया। उनके पतन के बाद त्रिपुरी के कलचुरी, मालवा के परमार और बुंदेलखंड के चंदेल शासक के रूप में उभरे।

नौवीं शताब्दी ईस्वी में यहां नन्नू ने चंदेल वंश की स्थापना की जिस के वंशजों ने जेज्जाक राज्य का नाम बदलकर जेज्जाकभुक्ति कर दिया। चंदेल वंश के सबसे प्रसिद्ध  शासक राजा धंग थे। जिनका राज्य उत्तर में ग्वालियर से लेकर दक्षिण में विदिशा और उत्तर पूर्व में इलाहाबाद तक फैला हुआ था। खजुराहो के अधिकांश मंदिर राजा धंग और उनके पिता यशोवर्मन के शासनकाल में ही बने। जिनका शासन 10वीं से तेरहवीं शताब्दी ईसवी के आसपास था। इस वंश का अंतिम शासक हम्मीरवर्मन था। 

चंदेल वंश के पतन के बाद 14 वीं से 16 वीं शताब्दी के बीच यहां बुंदेला राजाओं का शासन रहा। 1531 ईसवी में प्रताप बुंदेला ने ओरछा को अपनी राजधानी बनाया। छत्रसाल बुंदेला को बुंदेला के सबसे महान राजा में से एक माना जाता है। उन्होंने बुंदेलखंड की स्वतंत्रता के लिए मुगलों से युद्ध किया। जिस संघर्ष में बाजीराव पेशवा ने उनकी मदद की थी। मध्ययुगीन कालखंड में यहां पर विभिन्न मराठा सामंतों का बोलबाला हो गया। जिनमें प्रमुख रूप से सिंधिया, होल्कर और पवार थे। 

1802 के ब्रिटिश शासन के दौरान बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों को मराठों ने अंग्रेजों को सौंप दिया। जिसे बेसिन की संधि का नाम से जाना गया। 1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद अंग्रेजों ने बुंदेलखंड पर पूर्ण रूप से कब्जा कर लिया। जिसे बाद में बुंदेलखंड एजेंसी में संगठित किया गया। 

बुंदेलखंड का भूगोल

बुंदेलखंड वास्तव में भौगोलिक रूप से अपनी एक अलग पहचान रखता है। यह मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्र में विस्तृत है। बुंदेलखंड का सबसे उत्तरी भाग यमुना तथा दक्षिणी भाग विंध्याचल पर्वत तक विस्तृत है। यहां पर यमुना नदी और चंबल नदी के बीच एक संकरी पट्टी है। जो बीहड़ के कारण से डकैतों से का गढ़ रही है। 

यमुना नदी के दक्षिण में बुंदेलखंड का मैदान है। जिसमें मुख्य रुप से जालौन, झांसी, हमीरपुर, बांदा और महोबा तथा चित्रकूट जिलों के कुछ हिस्से आते हैं। पूर्व से पश्चिम की तरफ बढ़ने पर मिट्टी की गुणवत्ता बदलती है जैसे जालौन जिले का अधिकांश पश्चिमी भाग रेतीला है। मैदानी भाग के कुछ हिस्सों में नहरों द्वारा सिंचाई की जाती है। बांदा का मैदान बुंदेलखंड के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में आता है। चित्रकूट जिले की तरफ बढ़ने पर मिट्टी सामान्य रूप से कम उर्वर है। दक्षिण की ओर बुंदेलखंड के उच्च मध्यवर्ती क्षेत्र आ जाते है। झांसी, ललितपुर, टीकमगढ़, छतरपुर जिलों में बुंदेलखंड उच्च भूमि को बुंदेलखंड इंटरमीडिएट भी कहा जाता है। जो उच्च कृषि उत्पादन के लिए  उपयुक्त है। 

बुंदेलखंड के मध्यवर्ती क्षेत्र के दक्षिण में बुंदेलखंड का पठार या अपलैंड है। जो ललितपुर, टीकमगढ़, चित्रकूट और पन्ना जिलों के दक्षिणी भागों को कवर करता है। इस पठार की विशेषता चट्टानी बंजर भूमि है। यहां पर जल भंडारण की बहुत सी संभावनाएं हैं।

बुंदेलखंड पठार के पूर्व में दो अलग-अलग वन क्षेत्र पाए जाते हैं। पहला पन्ना जिले में समतल तथा पहाड़ी क्षेत्र, यह क्षेत्र कभी घने जंगलों से भरा हुआ था। परंतु प्रशासनिक अनदेखी के कारण अधिकांश जंगल खराब गुणवत्ता वाले हैं। वर्तमान समय में यह बुंदेलखंड का सबसे अधिक वनाच्छादित क्षेत्र है। दक्षिण में पाठा पठार एक चट्टानी क्षेत्र है। जिसको नदियों ने गहरी घाटियों के रूप में काटा है। यह मानसून के समय जल रहता है और बाद में कुछ महीने में  सूख जाते हैं। इसमें अधिकांश झाड़ीदार जंगल उपस्थित हैं। यह काफी दुर्गम इलाका है। यहां पर अधिकांश कोल आदिवासी रहते हैं। यहां कृषि के लिए पतली पट्टी का आवरण पाया जाता है।

बुंदेलखंड का सबसे दक्षिणी हिस्सा सागर का पठार है। जो मुख्यतः मालवा पठार का पूर्वी हिस्सा है। यह लगभग 1400 फीट ऊंचा है। इस क्षेत्र में मुख्यतः कपास के लिए उपयुक्त काली मिट्टी पाई जाती है। यहां पर भारनेर और कैमूर नामक पहाड़ी श्रृंखला भी पाई जाती हैं। इस भाग में सुनार नदी के आसपास का भाग अपेक्षाकृत समतल है। जिसमें दमोह नगर स्थित है।

बुंदेलखंड क्षेत्र के औसत तापमान में भी काफी अंतर है यह एक गर्म और अर्ध-आर्द्र क्षेत्र है। यहां का न्यूनतम तापमान 6 डिग्री से 12 डिग्री सेल्सियस तक तथा अधिकतम तापमान 38 से 48 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता है। यह पर बांदा भारत में सबसे गर्म स्थानों में से एक है। यहां हर साल लू के कारण कई लोग मारे जाते हैं। 

बुंदेलखंड में वर्षा मध्यम श्रेणी की होती है। जो उत्तर पश्चिम में लगभग 75 सेंटीमीटर और दक्षिण पूर्व में 125 सेंटीमीटर के आसपास है लेकिन यहां वर्षा का वितरण अनिश्चित है। यहां पर 95% से अधिक वर्षा जून और सितंबर के बीच में होती है हालांकि नवंबर से मई के बीच वर्षा की थोड़ी मात्रा प्राप्त होती है। जो कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। यहां पर अभेद्य चट्टानों के कारण खराब भूजल पुनर्भरण की समस्या बढ़ जाती है। बुंदेलखंड के जिले जालौन, बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर और महोबा सुखा प्रवण क्षेत्रों की श्रेणी में आते हैं। 

बुंदेलखंड के भू विज्ञान और स्थलाकृति तथा प्राप्त वर्षा के पैटर्न के आधार पर यहां पर सूखा और बाढ़ दोनों का खतरा बना रहता है। पूरे क्षेत्र के अधिकांश हिस्से में काफी गहराई तक अभेद्य चट्टानी परत पाई जाती है जो भूजल पुनर्भरण में समस्या उत्पन्न करती हैं। कई जिलों में अनियमित वर्षा और वनों के पतले आवरण के कारण समस्या और बढ़ जाती है। इसीलिए बुंदेलखंड के किसी न किसी हिस्से में सूखा या बाढ़ की समस्या किसी न किसी वर्ष बनी रहती है। राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण की एक रिपोर्ट के अनुसार बुंदेलखंड में प्रत्येक 2 से 4 साल के अंतर में गंभीर कृषि सूखा पड़ता है। जिसका प्रभाव क्षेत्र के सभी 13 जिलों में रहता है। रिपोर्ट के अनुसार एमपी बुंदेलखंड में जलाशयों में 15 से 47% की गिरावट और यूपी बुंदेलखंड के जलाशयों में 28 से 64% की गिरावट देखी गई। 70% से अधिक भूजल पुनर्भरण स्रोत सूख गए हैं जैसे तालाब इत्यादि। जिससे भूजल में भारी गिरावट आई है। इसका परिणाम यह हुआ कि अनाज उत्पादन में 22% तक की गिरावट देखी गई। जिसके कारण भुखमरी से यहां पर लोगों का लगभग 40% तक का पलायन देखा गया। 

मिट्टी तथा वनसम्पदा

बुंदेलखंड में मिट्टियों के कई प्रकार हैं। यहां पर अधिकांशतः मिट्टी 6 से 15 मीटर की गहराई तक पाई जाती है। उसके बाद अभेद्य चट्टानों की परत आती है। मोटे तौर पर यहां पर दो श्रेणियों की मिट्टियां पायीं जातीं हैं, लाल मिट्टी और काली मिट्टी लेकिन दोनों ही श्रेणियों की मिट्टियों में खराब जैविक पदार्थ है। यहां काली मिट्टी की एक किस्म को मार कहा जाता है। जो आमतौर पर काली कपास मिट्टी कही जाती है। इस मिट्टी में जलजमाव की संभावना अधिक होती है तथा इसमें कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक है। यह मिट्टी जालौन, हमीरपुर, झांसी और बांदा जिलों के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। यह छोटे-छोटे टुकड़ों में अन्य जिलों में भी पाई जाती है जैसे दक्षिणी ललितपुर और सागर के कुछ हिस्सों में। 

बुंदेलखंड में बंजर भूमि की मात्रा अधिक है। भारत सरकार के भूमि संसाधन विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार यहां पर लगभग 11000 वर्ग किलोमीटर से अधिक का क्षेत्र बंजर भूमि के अंतर्गत आता है। बंजर भूमि को भी कई प्रकार से वर्गीकृत किया गया है। उथली, मध्यम या गहरी नालियों से प्रभावित भूमि, तराई इलाकों में झाड़-झंखाड़ बंजर भूमि, अवक्रमित अधिसूचित वन भूमि, और बंजर चट्टानी भूमि जो पूरी तरह से अनुपयोगी भूमि है। बुंदेलखंड की कुल बंजर भूमि का आधे से अधिक भाग झाड़ियों सहित बंजर भूमि है। कुछ बुंदेलखंड इंटरमीडिएट क्षेत्र में पाई जाती है तथा एक चौथाई हिस्सा अवक्रमित अधिसूचित वन भूमि है। जो मुख्यतः बुंदेलखंड अपलैंड और सागर और दमोह पठार में पाई जाती है। व्यापक रूप से उत्खनन किए जाने के कारण बुंदेलखंड में भूमि क्षरण बहुत तेजी से बढ़ रहा है। भूमि क्षरण का सबसे अधिक प्रभाव टीकमगढ़ में दिखाई देता है। यदि उत्खनन ऐसे ही चलता रहा तो जल्द ही झांसी, चित्रकूट और महोबा जिलों में भी भूमि क्षरण एक व्यापक समस्या हो जाएगी। बुंदेलखंड में मिट्टी  के  कटाव और भूमि क्षरण के कारण मिट्टी की कमी की समस्या उत्पन्न हो रही है। भूमि क्षरण के कारण कृषि योग्य भूमि अनुपयुक्त हो रही है। जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित जिले बांदा, हमीरपुर और दतिया हैं। 

बुंदेलखंड में प्राचीन काल से ही सघन वन रहा है। जिसका वर्णन कई ग्रंथों में किया गया है। मध्यकाल से हमें पन्ना के जंगलों में हाथियों के शिकार का संदर्भ मिलता है। ब्रिटिश काल में बाघ, तेंदुआ, लकड़बग्घा, हिरण, मगरमच्छ और अन्य कई जंगली जानवरों का उल्लेख मिलता है। हालांकि अब बुंदेलखंड में बहुत ही कम घने जंगल बचे हैं। जिससे जंगली जानवरों का दिखना भी लगभग दुर्लभ बन गया है। अब वन क्षेत्र केवल नामित अभयारण्य और दक्षिण बुंदेलखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में ही बचे हुए हैं। यूपी के बुंदेलखंड में 8% से भी कम वन भूमि बची हुई है। जिसमें महत्वपूर्ण वन केवल ललितपुर चित्रकूट जिलों के कुछ हिस्सों में ही पाए जाते हैं। यूपी बुंदेलखंड पूरे उत्तर प्रदेश  के वन क्षेत्र का लगभग छठवां हिस्सा कवर करता है। जिसमें लगभग 6% से भी कम वन क्षेत्र है। 

खनिज संपदा 

बुंदेलखंड में पर्याप्त खनिज पदार्थ मौजूद है। यहां के पन्ना जिले के हीरे सबसे प्रसिद्ध रहे हैं। जो मध्यकाल से बहुत बेशकीमती रहे हैं। जब यह पत्थर केवल भारत में ही पाया जाता था। हालांकि बाद में ब्राजील और अफ्रीका में हीरे की खोज होने के बाद यहां के हीरे का मूल्य घट गया। यहां पर बेसाल्टिक और बलुआ पत्थर का काफी जमाव है। यहां पर दमोह, छतरपुर और दतिया में चूना पत्थर तथा दक्षिणी ललितपुर में बेसाल्टिक चट्टाने, पन्ना और सागर में बलुआ पत्थर पाया जाता है। प्रारंभिक काल से ही यहां ग्रेनाइट जैसी संरचनाएं पाए जाती हैं। जिन्हें बुंदेलखंड ग्रेनाइट कहा जाता है। झांसी, ललितपुर, महोबा, बांदा, दतिया, छतरपुर, पन्ना और सागर जिलो में गुलाबी लाल और ग्रे ग्रेनाइट पाए जाते हैं। सागर और पन्ना के कुछ हिस्सों में बहुरंगी और काली ग्रेनाइट पाए जाते हैं। छतरपुर जिले में पाई जाने वाली  झांसी रेड और फार्च्यून रेड नाम की दो बेशकीमती किस्मे पाई जाती हैं। यहां पर सफेद, बफ, क्रीम, गुलाबी और लाल बलुआ पत्थर विंध्य की पहाड़ियों के विभिन्न परतों में पाई जाती हैं। जो मुख्यतः पन्ना और सागर जिला में है। इस बलुआ पत्थर का उपयोग विभिन्न प्रकार की कलाकृतियां बनाने में किया जाता है। ललितपुर में बलुआ पत्थर की दो प्रमुख किस्मे पायीं जातीं हैं। जिन्हें ललितपुर ग्रे और ललितपुर पीला कहा जाता है। बलुआ पत्थर की अन्य किस्मे छतरपुर में भी पाई जाती हैं। यहां पर पायरोफलेट नामक एक नरम और हल्के पत्थर निक्षेप पाए जाते हैं। जो मुख्यत झांसी, ललितपुर, महोबा, टीकमगढ़ और छतरपुर जिलों में है। इसका उपयोग मुख्यतः सजावटी सामान बनाने के लिए किया जाता है। इसको दोस्पोर के साथ मिलाकर औद्योगिक उपयोग भी किया जाता है। यहां पर सड़कें और भवन निर्माण के लिए पर्याप्त मात्रा में चुना पत्थर पाया जाता है। जो मुख्यत सागर, दमोह और पन्ना जिलों में है। बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले में पाई जाने वाली सिलिका रेत भारत में कांच निर्माण के लिए एक अच्छा स्रोत है। 

ललितपुर और छतरपुर में पाया जाने वाला रॉक फास्फेट का उपयोग उर्वरक उद्योग में किया जाता है। ललितपुर में निम्न श्रेणी के लौह अयस्क के भंडार भी हैं। दतिया, पन्ना और टीकमगढ़ में पाई जाने वाली मिट्टी का उपयोग चुना और सीमेंट उद्योग में किया जाता है। बांदा और सागर जिले में डोलोमाइट पाया जाता है। 

बुंदेलखंडी त्यौहार 

भारतीय संस्कृति में बुंदेलखंड की एक अलग पहचान रही है। यहां के त्योहारों का एक अपना अलग ही पौराणिक व आध्यात्मिक महत्व है। यहां गनगौर नामक एक त्यौहार है जो चैत्र शुक्ल तीज को होता है। जिसे सुहागन स्त्रियां ही मनाती हैं। जिसमें वह पार्वती की पूजा करतीं हैं। यह सौभाग्य को देने वाला त्यौहार है। यह बुंदेलखंड की धरती पर प्राचीन समय से ही मनाया जा रहा है। चैत्र मास की पूर्णिमा को ही चैती पूनै नामक एक पर्व मनाया जाता है। 

यहां पर कार्य सिद्धि के लिए मनाया जाने वाला प्रमुख त्यौहार असमाई है। जो वैशाख की दूज को मनाया जाता है। यहां पर अकती या अक्षय तृतीया पर्व का अपना एक बड़ा महत्व है। कहा जाता है कि इसी दिन से सतयुग प्रारंभ हुआ था और प्रसिद्ध तीर्थ बद्रीनाथ के कपाट भी इसी दिन खुलते हैं। यह त्यौहार वैशाख शुक्ल तीज को मनाया जाता है। बरा बरसात या बट सावित्री ब्रत में वट वृक्ष की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से पुत्र और पति की आयु बढ़ती है तथा स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती होती हैं। इस व्रत से सती सावित्री की कहानी जुड़ी हुई है। 

 आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गृह बधुओं का पूजन किया जाता है। जिस त्यौहार हो कुनघुसूँ पूनै कहां जाता है। यह मुख्यतः नारियों के सम्मान में किया जाता है। हरी जोत त्यौहार सावन मास की अमावस्या को मनाया जाता है जो कुनघुसूँ पूनै के समान ही है।  इसमें बेटियों की पूजा की जाती है। राखी का त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन के रूप में मनाया जाता है। यह भाई बहनों के लिए बहुत ही पवित्र त्यौहार है। हरछठ का त्यौहार भादो मास के कृष्ण पक्ष को मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था।  यह व्रत पुत्रवान स्त्रियां ही करती हैं। कन्हैया आठें त्यौहार जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। बुंदेलखंड में सौभाग्यवती स्त्रियां तीजा त्यौहार मानतीं हैं जिसे घर-घर मनाया जाता है। इसमें रात्रि जागरण का भी विधान है। जाने अनजाने में हुए पाप की क्षमा याचना के लिए भादो की शुक्ल पक्ष की पंचमी को रिसि पांचे त्यौहार मनाया जाता है। बुंदेलखंड में मनाए जाने वाले अन्य त्योहारों में महालक्ष्मी नौरता, दसरओ, शरद पूने जिसे शरद पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन से ही बुंदेलखंड में कार्तिक स्नान शुरू हो जाता है। पुराणों के अनुसार इस रात्रि में चंद्रमा से अमृत की वर्षा होती है। जिससे व्यक्ति के जीवन में हर्ष और उल्लास की प्राप्ति होती है। धनतेरस कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है। इसमें देवताओं के वैद्य भगवान धनवंतरी की पूजा की जाती है। इसे नरक चतुर्दशी के नाम से भी जानते हैं। कार्तिक मास में ही बुंदेलखंड के सबसे बड़े त्यौहारों में माना जाने वाला प्रमुख त्यौहार दिवारी है। जिसे दीपावली के नाम से भी जानते हैं। 

लोक नृत्य व लोक गीत 

बुंदेलखंड के प्रमुख लोक नृत्य राई नृत्य, सेरा नृत्य, ढिमरयाई नृत्य, कछियाई नृत्य, मोनिया नृत्य प्रमुख हैं। यहां के  लोकप्रिय नृत्य कबीर पंथी नृत्य, जुगिया नृत्य, जबारा नृत्य, रावला नृत्य, ढोला मारु नृत्य, दिलदिल घोड़ी नृत्य, सपेरा नृत्य हैं। जो भारतीय संस्कृति के इतिहास में अपनी एक अमिट और अलग छाप रखते हैं।

बुंदेलखंड में गाए जाने वाले प्रमुख लोकगीत राई, लोरी, ढिमरिया, लांगुरिया, रसिया, फाग, लमटेरा, कजरी, देवी गीत, दादरा, भजन, सावन, मल्हार आल्हा हैं। 

प्रमुख पर्यटन स्थल

  1. बृहस्पति कुंड 
  2. शबरी झरना 
  3. श्री परमहंस धाकुण्डि आश्रम 
  4. राहिल सागर सूर्य मंदिर 
  5. कालिंजर किला 
  6. पन्ना घाटी 
  7. खजुराहो मंदिर 
  8. ओरछा मंदिर 
  9. चित्रकूट धाम 
  10. सागर 
  11. चरखारी (बुंदेलखंड का कश्मीर)
  12. चतुर्भुज मंदिर 
  13. जहांगीर महल 
  14. ओरछा अभ्यारण्य
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